पशु वध पर प्रतिबंध का निर्णय पलटा

वध के लिए पशुओं की खरीद-फरोख्त पर पिछले साल लगाई गई विवादास्पद रोक के निर्णय से सरकार के पीछे हटने का दिन इतनी जल्दी आ जाएगा, इसका अंदाजा नहीं था। खेती आधारित अर्थव्यवस्था को बहुतेरे कारकों के चलते चोट पहुंच रही है और पशुओं के व्यापार के ऊपर आभासी प्रतिबंध लगाकर उन पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना भी काम चलाया जा सकता है। सरकार ने जब मूल अधिसूचना जारी की थी तब यह कदम धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके अलग पहचान बनाने की उसकी रणनीति का स्वाभाविक कदम माना जा रहा था। इस बारे में पुनर्विचार अनिवार्यता सिर्फ इसलिए नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने गोकशी रोकने के नाम पर सड़कों पर हो रही कवायद से कोई खास राजनीतिक लाभ न मिलने की बात पहले ही भांप ली वरन इसके चलते नीचे के पायदान पर आर्थिक गतिविधियों में भारी व्यवधान उत्पन्न हो रहा था, जिससे सभी धर्मों के लोग प्रभावित हो रहे थे। भले ही सरकार इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना चाह रही हो परंतु इसका परिणाम जूते से लेकर बटन तक के दामों में लगातार इजाफे के रूप में निकला। एक अध्ययन के मुताबिक अगर मूल अधिसूचना को सही तरीके से लागू किया जाए तो अकेले महाराष्ट्र को ही केवल बैलों को खिलाने के लिए 5000 करोड़ रुपए सालाना की जरूरत पड़ेगी। प्रस्तावित नए नियमों में कुछ पुरानी गड़बड़ियों जैसे कि बिक्री के लिए लाए गए पशु के साथ 'कत्ल के लिए नहीं' का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की जरूरत आदि को दुरुस्त करने की कोशिश की गई है। ऐसे क्षेत्र जहां गायों के प्रति जागरूकता बढ़ी है, इन कागजी कार्यवाहियों ने पशु व्यापार को मृतप्राय बना डाला है। राजनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण के चलते बहुत से राज्य भी उक्त प्रस्ताव के संबंध में उत्साही नहीं थे। इस मसले पर गंभीर विचार विमर्श इसलिए भी आवश्यक है, जिससे कि पशुओं को चिन्हित करने के लिए उनके सींग काटना, कान काटना, शरीर पर ठप्पे से दागने पर रोक लगाने के नियम बनाए जा सकें। प्रस्तावित नियमों में हर जिले में एक अच्छे प्रतिनिधित्व वाली समिति की परिकल्पना की गई है, जिसे वैधानिक व्यापार को बढ़ावा देने और उन क्रूरताओं, जिन्होंने इस व्यवसाय को समाप्तप्राय कर दिया है, को खत्म करने में सहायक होने के लिए अच्छे प्रोत्साहन और संसाधन की जरूरत होगी।