यह विडंबना ही है कि हम दसरे क्षेत्रों में तरक्की तो कर रहे हैं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में मासमों की हो रही मौतों को हम नहीं रोक पा रहे हैं। अममन समय बीतने के साथ समस्याओं के समाधान खोज लिए जाते हैं। लेकिन शिक्षा पद्धति को जानलेवा बनने से रोकने में हमारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। दिल्ली के एल्कॉन स्कूल में नौवीं कक्षा की एक छात्रा द्वारा की आत्महत्या इसी का दूसरा पहलू है। परिजनों का आरोप है कि विज्ञान की शिक्षिका अंकों को लेकर धमकाती रहती थी। सवाल है कि क्या क्लास का हर बच्चा टॉपर होता है? क्या जो बच्चे औसत दर्जे के हैं, उन्हें पढ़ने का हक नहीं है? अगर ऐसा है तो फिर इसके लिए स्कूल प्रशासन ही जिम्मेदार होंगे जो बच्चों की प्रतिभा को निखारने क लिए माटा फीस लेते हैं, लेकिन ऐसा करने में वे नाकाम रह निखारने के लिए मोटी फीस लेते हैं, लेकिन ऐसा करने में वे नाकाम रह जाते हैं। निजी विद्यालयों द्वारा सभी गड़बड़ियों का ठीकरा बच्चों या अभिभावकों पर फोड़ने की रिवायत चल पड़ी है।दरअसल, अपनी जिम्मेदारी से नजरें चुराकर बच्चों को प्रताड़ित करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। सहपाठियों के सामने छात्रों की बेइज्जती और क्लास में बच्चों के मजाक उड़ाने के मामले अक्सर सामने आते हैं। लेकिन इन पर कोई भी लगाम नहीं लगाता। इसके अलावा शिक्षकों द्वारा छेड़छाड़ एक बड़ी समस्या बनकर सामने आ रही है। यह हरकत शिक्षा पद्धति पर कई सवाल खड़े करती है। सवाल है कि अगर इस प्रकार के संस्कारहीन और गैर जिम्मेदार शिक्षक विद्यालयों में हों, फिर कौन माता-पिता अपने बच्चों को विद्यालय भेजना चाहेगा? इसके अलावा जो हमें गौर करने की जरूरत है, वो यह कि हमारे बच्चों में ऐसी कौन-सी समझ विकसित हो रही है जो उन्हें फेल हो जाने पर खुदकुशी के लिए उकसाती है।एनसीआरबी के मुताबिक भारत में प्रति घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है। हालिया आंकड़ों की बात करें तो पिछले तीन वर्षों में 26,500 से ज्यादा छात्र मौत को गले लगा चुके हैं। यह सूरत-ए-हाल बताता है कि हमारी शिक्षा पद्धति और अभिभावकों की अपेक्षाओं में कितना विरोधाभास है। एक तरफ स्कूल और कालेज बच्चों की प्रतिभा को निखारने में नाकाम हो एक तरफ स्क रहे हैं और दूसरी ओर अभिभावकों की उम्मीद बच्चों को टॉप कराने की रहती है। अभिभावकों को चाहिए कि वह उम्मीद करने के बजाय बच्चों के साथ संवाद और पारस्परिकता की संस्कृति विकसित करें। इससे न केवल बच्चों पर से दबाव हटेगा बल्कि उनके अंदर एक आत्मविश्वास भी जगेगा, जिससे आत्महत्या का यह सिलसिला रुक सकेगा परीक्षा में अंक लाने की यह रेस हमारे समाज और देश के लिए नासूर बनती जा रही है। बच्चों की काबिलियत को अंक की कसौटी पर ही आंका जाने लगा है। चाहे नामी गिरामी कॉलेजों में दाखिले की बात हो या निजी संस्थानों में नौकरियों की, लोगों की निगाहें अधिकतम अंक लाने पर ही टिक गई हैं। सच तो यह है कि काबिलियत को अंक की कसौटी पर आंकना पूरी तरह बेमानी है।दरअसल, भारत में संघ लोक सेवा आयोग सबसे बड़ी परीक्षा आयोजित कराने के लिए जाना जाता है और राज्य स्तर पर राज्य लोक सेवा आयोग। यह दोनों ही आयोग सिविल सेवा परीक्षा आयोजित कराते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन परीक्षाओं के लिए जरूरी शर्तों में शैक्षणिक योग्यता का जिक्र तो है पर जरूरी योग्यताओं में अंक फीसदी की कोई बाध्यता नहीं है। ऐसे में सवाल है कि माता-पिता या शिक्षकों द्वारा केवल प्राप्त अंक के आधार पर ही छात्रों के बारे में राय बना लेना कितना सही है?बच्चों में तनाव उत्पन्न होने के दूसरे कारणों पर नजर डालें तो कम उम्र में स्कूल में दाखलिा और होमवर्क के बढ़ते बोझ भी बच्चों के लिए परेशानी का सबब है। सौ फीसदी साक्षर देशों की बात करें तो वहां बच्चे ज्यादा दिनों तक बच्चे रहते हैं यानी सात वर्ष की उम्र में स्कूल जाना प्रारंभ करते हैं जबकि भारत में तीन वर्ष की उम्र में ही दाखलि की होड़ लगी रहती है। दूसरी ओर पूर्ण साक्षरता वाले देशों में बच्चों पर होमवर्क का भी बोझ नहीं डाला जाता । जाता ।
प्रतिभा का पैमाना मात्र अंक नहीं